शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014

भगेलू सिंह
      रामनगर किले पर तैनात पी ए सी के क्वार्टर गार्ड के जवान ने शाम के चार बजने की सूचना पीतल के घंटे को चार बार बजाकर दी। तभी चुंगी पर आते दिखे भगेलू सिंह। सफ़ेद लूँगी और गंजी पहने। सहेबन धोबी की दुकान पर दो मिनट के लिए रुके कुछ खादी के कुर्ते और धोतियाँ इस्तरी करने को दी और लल्लन की पान की दुकान पर आ गए। एक पान खिलाने को कहा, मौसम को कोसते हुए इंद्रदेव को एक मीठी सी गाली दी और बगल के पत्थर पर बैठ गए। यह उनका रोजाना का क्रम था। शाम चार बजे आते फिर रात आठ बजे तक यहीं बैठते। भगेलू सिंह काफी बड़े काश्तकार थे। बाप दादाओं ने इतनी जमीन जायदाद छोड़ रखी थी कि उन्होने कभी कोई नौकरी नहीं की। खाता पीता परिवार और बड़ा लड़का कॉलेज में प्राध्यापक। तीनों बेटियों की शादी भी हो चुकी थी। दामाद नौकरी में थे। इससे ज्यादा सुख एक गृहस्थ को क्या चाहिए।लेकिन कहते हैं कि अपनी बड़ाई सुनने की लत बड़ी खतरनाक होती है। इसका नशा किसी गाँजा, भांग, अफीम या कि ड्रग्स से भी खतरनाक होता है। इस बड़ाई सुनने की लत के महरोगी थे भगेलू सिंह।
      यह लत इस कदर लग चुकी थी कि उनके जीवन चर्या में इसका असर हर जगह दिखता। जैसे ब्याह-शादी के निमंत्रण में यदि कार्ड पर सिर्फ श्री भगेलू सिंह, रामनगर लिखा होता तो लड़के की शादी की बारात में वो नहीं जाते, और यदि लड़की की शादी हो तो बारात-जयमाला आदि के बाद जाते और खाने के बाद शगुन का लिफाफा जिसमें 21 रु होते लड़की के पिता या जो कॉपी में लिख रहा होता, उसे देकर खाने की कमियाँ गिनाते हुए घर चले आते। यदि कार्ड पर ठा. भगेलू सिंह, बड़ा घराना आदि लिखा होता तो वे लड़के की शादी के बारात में जाते और लड़की की शादी में 101 रु का शगुन और बारात से पहले पहुँचते, खाने की बुराई नहीं। उनकी इस आदत का परीक्षण एक बार जगदीश पांडे ने अपनी बहन की शादी में किया। निमंत्रण पत्र पर लिखा, ‘श्रीयुत ठाकुर भगेलू सिंह जी (बड़ा  घराना), वरिष्ठ नेता कांग्रेस (इ), रामनगर। कहने की जरूरत नहीं कि भगेलू सिंह विवाह से पहले जगदीश से अपने लायक कोई काम पूछा। विवाह के दिन अपने 2 नौकरों के साथ दोपहर ढलते ही पहुँच गए, हलवाई, सजावट वालों और टेंट वालों को ठीक से काम करने के लिए धमकाते रहे। शगुन में 501 रु और साड़ी भी दी और जब सुबह विदाई में हलवे और चाय के लिए चीनी कम पड़ रही थी तो नथुनी साव से सुबह सुबह दुकान खुलवाकर पचास किलो का एक बोरा भी उधार मंगा दिया। बाद में जब जगदीश के पिता जी चीनी की रकम लौटाने पहुंचे तो भगेलू सिंह ने कहा किस बात का पैसा? क्या सारी चीनी तुम खाए हो? जगदीश के पिता बोले नहीं। भगेलू बोले फिर किस बात का पैसा? जगदीश के पिता फिर बोले कि हमारी बेटी की शादी में आपका पैसा लगा वह तो मुझे लौटाना है। तब तक भगेलू सिंह से 2 मिलने वाले आ गए। भगेलू बोले कि अबे पंडित क्या तुम्हारी बेटी हमारी बेटी नहीं है? पंडित जी निरुत्तर हो गए। उनके जाने के बाद मिलने वाले 2 व्यक्तियों ने भगेलू सिंह को धर्मात्मा और दानशील मान लिया लेकिन उनका भ्रम ज्यादा देर न रह सका। जैसे ही कुछ सकुचाते हुए उन दोनों ने पाँच हज़ार रु की आवश्यकता बताई, भगेलू सिंह ने तुरंत हामी भर दी और घर के भीतर से रु लेकर आ गए। उन दोनों में से बड़े ने जैसे ही कहा कि बाबू साहब हम छह महीने में पैसे वापिस कर देंगे, भगेलू सिंह बोले कि छह महीने क्या छह साल में वापिस करो लेकिन ब्याज पाँच रु सैकड़े रहेगा और कुछ जमानत वगैरह लाए हो।      
      भगेलू सिंह अपनी युवावस्था में किसानों के आंदोलन में शरीक होते थे । संसोपा, दमकिपा से होते हुए लोकदल में शामिल होकर  दिल्ली लखनऊ आने जाने लगे थे और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री चरण सिंह के साथ एक तस्वीर भी खिंचवा ली थी, जो बहुत दिन तक उनके बैठक में लगी थी। नेता बनने की कोशिश में लगे ही थे कि केंद्र कांग्रेस सरकार ने आपातकाल लगा दिया। विपक्षी दल के लोग जेल भेजे जाने लगे। भगेलू सिंह वैसे निर्भीक व्यक्ति थे लेकिन खेती किसानी ठीक ठाक चलती रहे और खेतों पर कोई कब्जा न कर ले इसलिए आपातकाल लगते ही कांग्रेस के सदस्य बन गए। घर के ऊपर एक चरखेवाला तिरंगा भी फहरा दिया, ताकि दूर से ही पता चले की किसी कांग्रेसी का घर है। शायद यह झण्डा कभी बदला नहीं गया था क्योंकि आपात काल खत्म हुए लगभग पचीस वर्षों के बाद दूर से यह लगता था की किसी पोछे के कपड़े को डंडे से खड़ा किया गया है। यद्यपि उनके कुछ विरोधियों ने थाने मे राष्ट्र ध्वज के अपमान का आरोप लगाकर गुमनाम शिकायत भेजी थी, फिर भी कुछ न हो सका। एक तो भगेलू सिंह गणमान्य व्यक्ति थे और दूसरा तर्क यह कि झण्डा कांग्रेस का है न कि राष्ट्रीय इसलिए पुलिस के बाहर का मामला है। उत्तर प्रदेश में जब तक कांग्रेस के सरकार रही तब तक भगेलू सिंह की कस्बे में काफी इज्ज़त थी। यद्यपि भगेलू सिंह पर न तो कोई मुकदमा था न ही उन्होने किसी पर कोई मुकदमा कर रखा था, फिर भी रोजाना सुबह कचहरी और शाम को थाने पर जाकर एकाध घंटा बैठना उनकी नियमित दिनचर्या थी। कस्बे ही नहीं आस पास के गाँव में भी कहीं झगड़ा,लड़ाई, चोरी, डकैती या जुए आदि के साथ साथ मामला दीवानी का हो या फ़ौजदारी का, लोग भगेलू सिंह को साथ लेकर ही थाने में जाते थे। यहीं नहीं बिना पुलिस कचहरी के भी छोटी मोटी घटनाओं में भगेलू सिंह सुलह करवा दिया करते थे।
      जब तक उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार रही, भगेलू सिंह स्वनाम धन्य नेता थे। हालांकि कांग्रेस पार्टी ने कभी उनको कोई महत्वपूर्ण पद नहीं दिया लेकिन वे चवन्नीया सदस्य रहकर भी जलवे में  वे किसी विधायक से कम नहीं थे। सन 1989 में जनता दल की सरकार बनी। बहुत से पुराने और नए कांग्रेसी नेतागण और कार्यकर्ता जनता दल में शामिल हो गए। सभी को उम्मीद थी कि भगेलू सिंह भी जनता दल में शामिल हो जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उनके राजनीतिक गुरु बृजबिहारी मिसिर ने अनुमान लगाया कि 1977 की जनता पार्टी की तर्ज पर ही 2-4 सालों में जनता दल का कुनबा बिखर जाएगा और कांग्रेस प्रदेश में सरकार बनाएगी।  और तब तक पार्टी के संकट के दिनों के समर्पित कार्यकर्ता के रूप में भगेलू सिंह का कद काफी बढ़ जाएगा और अगले चुनाव तक वो लखनऊ या दिल्ली का टिकट पा ही लेंगे। भगेलू सिंह उनकी सलाह पर अमल करते रहे।एक सच्चे सिपाही के तौर पर अपने विरोधियों और उनके नेताओं पर बेबाक टिप्पणियाँ भी करते रहे। गाहे बगाहे अनशन पर भी बैठे लेकिन उनके स्वप्नों को पंख न मिल सका। 1989 से सत्रह बरस बीत गए लेकिन कांग्रेस फिर सत्ता में नहीं आ सकी थी। इधर उनके चेले चपाटे कार्यकर्ता से नेता बनने लगे थे। प्रदेश कांग्रेस कमेटी की नई कार्यकारिणी में उनकी बिना सहमति के युवा जोश के नाम पर उनके एक चेले रघुनाथ को पार्टी जिलाध्यक्ष बना दिया गया। यह बात उन्हे बहुत खली लेकिन उन्होने यह जाहिर किया कि उस चेले की सिफ़ारिश प्रदेश कमेटी से उन्होंने ही की थी।
      यद्यपि चुंगी पर बैठनेवाले भगेलू सिंह की डींगों से बखूबी वाकिफ थे लेकिन शाम की चाय या पान और थोड़ा मनोरंजन के चलते सभी हाँ में हाँ मिला देते। उनकी डींगों का समय शाम को तय था। भगेलू जानते थे कि सब पीठ पीछे उनका मज़ाक उड़ते हैं लेकिन अपनी आदत से वो लाचार थे। बढ़ती उम्र के कारण अब रोजाना थाना, कचहरी का चक्कर उनसे नहीं लग पता था और यू पी में प्रशासन और पुलिस अधिकारियों के तबादले इतनी जल्दी होने लगे थे कि किसी अधिकारी से परिचय कुछ परवान चढ़ता , इससे पहले उसकी बदली हो जाती। पहले कि तरह डेढ़ दो साल की पोस्टिंग अपने आप में बड़ी बात थी। एक दिन अचानक नाटे मिस्त्री के बेटे को जुआ खेलते हुए पुलिस पकड़ ले गई। नाटे सिफ़ारिश के लिए भगेलू सिंह के पास आए। भगेलू सिंह थाने गए और अपनी हर कोशिश के बाद भी नाटे के बेटे को छुड़ा न सके। नाटे ने रघुनाथ से संपर्क किया और उसका बेटा कुछ घंटों में छूट गया। हालांकि उन्हें थोड़ा झटका लगा फिर भी उन्होने नाटे को सफाई दी कि इस दारोगा को एक बार मैं एसपी से डांट लगवा चुका हूँ इसलिए बदमाश ने बदला लिया। नाटे मुस्करा कर चला गया।
      कुछ ही दिनों बाद अखबार में खबर आई कि कांग्रेस का वार्षिक महाधिवेशन 20-23 अक्तूबर को  बंगलोर में होगा। भगेलू सिंह ने तारीख और समय नोट कर लिया। चुंगी के कुछ आगे गुलाब कबाड़ी का लड़का श्यामबाबू रोजाना डिग्री कॉलेज में पढ़ने शहर जाता था। अगली सुबह वह जैसे ही घर से निकला सुबह भगेलू सिंह ने उसे आवाज दी और आस पास बैठे लोंगों को सुना कर कहा, बेटा शहर जा रहे हो तो मेरा इलाहाबाद से बंगलोर का रेल में आरक्षण करा देना। 17 या 18 अक्तूबर को जाने का और 24 को उधर से लौटने का। याद रखना वरिष्ठ नागरिक वाला टिकट लेना। उम्र पैंसठ साल। यह कहते हुए उन्होने सौ सौ के कुछ नोट श्यामबाबू को दे दिए। कहने की आवश्यकता नहीं कि शाम तक इलाके में हल्ला मच चुका था कि भगेलू सिंह कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में बंगलोर जा रहे हैं। कुछ विरोधी दल वालों ने प्रतिवाद भी किया कि अरे नहीं इनको कौन पूछता है कांग्रेस में, तब लोग कहते कि नहीं गुलाब कबाड़ी के लड़के को खुद उनहोंने टिकट के पैसे दिए और शाम को लड़का टिकट भी ले आया जिसे चुंगी पर भगेलू सिंह को सौंपते उसे कई लोगों ने देखा। जिस कस्बे से लोग बंबई कमाने के अलावा बस अगल बगल के जिलों तक ही आते जाते हों वहाँ भगेलू सिंह का बंगलोर जाना वह भी कांग्रेस सम्मेलन में एक बड़ी खबर थी। लोगों ने उत्सुकता वश पूछा कि क्या कोई निमंत्रण आया है? भगेलू सिंह जवाब देते कि हाँ फोन आया था। बाबू साहब (अर्जुन सिंह )और तिवारी जी (नारायण दत्त तिवारी ) ने भी आग्रह किया है। वो तो दिल्ली बुला रहे थे लेकिन मैंने ही मना कर दिया। लोग फिर पूछते कि आप ही को क्यों बुलाया? जिला और मण्डल कमेटियों की छोड़िए, यहाँ तो प्रदेश कमेटी से भी गिने चुने लोग ही जा रहे हैं। फिर भगेलू सिंह ठहाका मार कर जवाब देते, ‘गुरु यही तो मार्के की बात है। जब से युवा जोश के चक्कर में नए नए लौंडों को पदाधिकारी बनाया गया है, तब से पार्टी की दुर्गति हो रही है। नए लौंडे-लफाड़ी सब क्या जानेंगे कि संगठन क्या होता है? सबको साथ लेकर चलने की कूबत है नहीं इस नई पीढ़ी में। इसीलिए इस बार हाई कमान ने वरिष्ठ कांग्रेसियों को ज्यादा तवज्जो दी है। हम तो गुरु एडवांस में रिज़र्वेशन करा लिए हैं। ई वेटिंग सेटिंग के चक्कर में इसको उसको फोन घुमाने के चक्कर में कौन पड़े। इसके साथ वो व्यंग्य से चुटकी लेते, ‘पता नहीं रघुनथवा किस गाड़ी से जा रहा है? कोई कहता रघुनाथ नहीं जा रहे हैं, उनको निमंत्रण नहीं मिला। तब भगेलू सिंह कहते हो सकता है बुलावा डाक से आ रहा हो। और नहीं भी आवे तो हम उसको अपने साथ ले चलेंगे। हमारा तो बर्थ कनफर्म है। बारी बारी से कमर सीधी कर लिया जाएगा।  अपना बच्चा है, देश दुनिया देखनी चाहिए। अभी उसको बहुत आगे जाना है। भगेलू सिंह के करीबी रघुनाथ के लिए उनकी इतनी उदारता से हैरान थे और इस अफवाह को भी फैलाने लगे थे कि रघुनाथ को ज़िला अध्यक्ष होते हुए भी पार्टी ने नहीं पूछा। यह बात जब रघुनाथ तक भी पहुंची तो उसे हैरानी हुई लेकिन वह भीतर से थोड़ा डर गया। स्थानीय चुनाव में पार्टी की करारी हार से उसका अध्यक्ष पद स्वयं खतरे में था। आखिर भगेलू सिंह किसी जमाने में उसके गुरु थे। उसने तत्काल भगेलू सिंह को फोन घुमाया। बोला कि बाबूसाहब कल आपके दर्शन के लिए आ रहा हूँ। यद्यपि भगेलू दिनभर खाली रहते थे लेकिन बोले कि कल जरा गाजीपुर जाना है लेकिन दोपहर बाद लौट आऊँगा। उन्होने रघुनाथ को शाम साढ़े चार-पाँच बजे ही बुलाया।
      आदतन चार बजे वो चुंगी पर आ धमके। आज उन्होने गंजी लूँगी की जगह कुर्ता धोती पहन रखी थी । उनकी वेषभूषा को किसी ने ध्यान न दिया क्योंकि इस पहनावे में ही वो कस्बे से बाहर आते जाते थे। भगेलू सिंह ने किसी से यह चर्चा नहीं की कि पार्टी जिला अध्यक्ष आ रहा है। यद्यपि जयराम जलेबी वाले को कह रखा था कि पकौड़े और जलेबी का समान तैयार रखना और जैसे ही वो लोग आए, इशारा पाते ही नाश्ता लगा देना। पाँच बजे तक रोजाना की तरह चुंगी की चाय पान की दुकानों पर लोग जमा हो गए थे। भगेलू सिंह ने पहले से ही बेंच पर न बैठ एक कुर्सी पर आसन जमा रखा था। बंगलोर की गाड़ी, मौसम, दूरी आदि पर चर्चा हो ही रही थी कि अचानक एक जीप आई जिसपर एक बोर्ड लगा था जिलाध्यक्ष कांग्रेस कमेटी। जीप से रघुनाथ द्विवेदी उतरे और लपक कर भगेलू सिंह के चरण स्पर्श की ओर बढ़े। भगेलू सिंह ने प्राचीन महाकाव्यों में वर्णित यशस्वी भव कहकर आशीर्वाद दिया। विरोधियों ने इसे दूरदर्शन के महाभारत धारावाहिक से की गई नकल माना। रघुनाथ ने कहा चाचा आपके घर ही जा रहा था,लेकिन आप यहीं मिल गए। भगेलू सिंह ठहाका लगते हुए बोले कि अरे ये भी अपना घर है भाई और यहाँ सब अपना परिवार है, लेकिन चलो घर चलते हैं, वहीं बात करेंगे। वे उठ ही रहे थे कि जयराम ने आवाज़ दी ठाकुरसाहब चाय तैयार है पीकर जाइए। भगेलू सिंह ने रघुनाथ से चाय के लिए बैठने को कहा और जयराम से बोले , ‘अबे खाली चाय पिलाओगे। अपना बच्चा इतने दिन बाद आया है, चल कुछ नाश्ता ले आ। चुंगी पर बैठे सभी लोगों को सहज ही समझ आ गया कि नाश्ता मांगने का यह तरीका स्वागत से अधिक यह जताने का प्रयास है कि जिलाध्यक्ष को वो बच्चा ही समझते हैं। भगेलू के विरोधी इस को उनका बड़बोलापन करार देते इससे पहले ही रघुनाथ बोल पड़े हाँ भाई चच्चा की उंगली पकड़कर हमलोगों ने राजनीति सीखी है, जो आदेश। भगेलू सिंह यही चाहते थे। नाश्ता जल्दी ही आ गया। कुल 15-20 लोग थे, इसलिए भगेलू सिंह ने सभी को चाय देने के लिए कहा।
      इधर उधर की बातें होने लगीं। तभी जगदीश पांडे वहाँ पहुंचे और जैसा कि भगेलू सिंह ने पहले से उन्हें सिखाया हुआ था, बोले, ‘अच्छा तो दोनों नेताजी लोग बंगलोर जाने की तैयारी करने के लिए मिले हैं । रघुनाथ चुप ही थे कि भगेलू सिंह बोल पड़े, हाँ हाँ आउर का बे , एक ही साथ जाएंगे। एक से भले दो। तुमको चलना हो तो तुमहू चलो। जगदीश ने रटाया हुआ वाक्य कह डाला,’ अरे भाई आपलोगों को तो ठहरने की, खाने पीने की जगह मिलेगी, पार्टी से किराया भी वापिस हो जाएगा। हमें उहाँ कौन पूछेगा। भगेलू कहते रहे,’ अबे चलो बंगलोर में कोई दिक्कत नहीं होगी। हमरे समधी के साढ़ू का छोटका बेटा एचएमटी कंपनी में मैनेजर है। उसके यहाँ रुका जाएगा। बड़ा बंगला है मोटर भी है। इसके बाद वे रघुनाथ से बोले कि चलो अब घर चलें। बाकी बात वहीं करेंगे। रघुनाथ ने कहा कि चच्चा अब चलने दीजिए। देर हो जाएगी। बात तो हो ही चुकी है। जरा एक मिनट अकेले में बात करनी है। दोनों ने थोड़ी दूर जाकर अकेले में बातें की। फिर रघुनाथ चला गया। उसके उतरे हुए चेहरे को देखकर भगेलू सिंह बहुत खुश थे कि तीर सही निशाने पर बैठा है। दो तीन दिन में सभी को मालूम हो गया कि ज़िले से भगेलू सिंह ही कांग्रेस के अधिवेशन में जा रहे हैं। हर नगर कस्बे में कुछ ऐसे चमचत्व प्रवीण होते हैं जो किसी को किसी बात की बधाई देने के लिए मरे जा रहे होते हैं। बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना की तर्ज पर सड़क या चौराहों पर बधाई के बहाने ऐसे बड़े बड़े होर्डिंग लगाते हैं, जिससे उनका भी थोड़ा बहुत प्रचार हो जाए । ऐसे लोगों ने भी भगेलू सिंह को बधाइयाँ दे डाली। कस्बे में चार पाँच होर्डिंग नज़र आने लगे। उन सबमें एक बात मुख्य रूप से लिखी थी कि कांग्रेस हाईकमान द्वारा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता श्री भगेलू सिंह को महाधिवेशन में आमंत्रित किए जाने पर हार्दिक बधाई। भगेलू सिंह के विरोधी इससे कुढ़ कर रह जाते। जब थाने के उस दारोगा ने देखा तब वह मन ही मन घबरा गया। एक दिन उसने चुंगी पर आकर स्वयं माफी मांगी और कहा कि ठाकुर साहब बच्चे की गलती को दिल से न लीजिएगा। कई बार पहचान में भूल हो जाती है। हम तो आपके सेवक हैं। भगेलू सिंह फिर से दमदार हो गए थे।
      अधिवेशन की नियत तारीख से दो दिन पहले दोपहर को भगेलू सिंह रामनगर से इलाहाबाद रवाना हो गए। लोगों ने कहा कि आपकी गाड़ी तो परसों है। उन्होने जवाब दिया कि इलाहाबाद में कुछ लोगों से मिलना है और कुछ ख़रीदारी भी करनी है। बस स्टेशन तक कुछ लोग उन्हें छोडने आए। लगभग तीन घंटे बाद वे अपने भांजे के यहाँ पहुंचे जो इलाहाबाद में ही रहता था। उसने भगेलू सिंह की काफी आवभगत की। कुछ देर बाद बोले कि बेटा एक काम है। मैंने सोचा कि कुछ तीरथ कर लूँ इसलिए रेल का आरक्षण करना है। जरा स्कूटर निकालो और मुझे आरक्षण केंद्र पर ले चलो। भांजे ने पूछा कहाँ जाएंगे? अभी तो वेटिंग ही मिलेगा। यात्रा की योजना पहले बनानी थी। भगेलू सिंह बोले बेटा जब भगवान का बुलावा आता है तो दिन तारीख नहीं देखते। तुम मुझे वहाँ छोडकर वापिस आ जाना मैं रिक्शे से लौट आऊँगा। भांजा कुछ शर्मा सा गया, बोला मामाजी आप यहीं रहें। मैं आपका टिकट करा देता हूँ। भगेलू सिंह ने कहा नहीं मुझे वहाँ जाने दो।
      आरक्षण केंद्र पहुँचकर भगेलू सिंह ने बंगलोर का आरक्षण रद्द कराया, बाकी के पैसे लिए और मन ही मन योजना बनाई। पहले इलाहाबाद से अयोध्या, फिर अयोध्या से मथुरा, और मथुरा से लखनऊ होते हुए वापस।छोटी छोटी दूरी की यात्रा साधारण टिकट से भी संभव है। न तो आरक्षण का झंझट और न ही आराम का।  लखनऊ एक दिन रहकर बंगलोर अधिवेशन की जरूरी जानकारी ले लेने से यात्रा वृतांत भी पूरा हो जाएगा।
      बस अगले दिन वे इसी योजना पर अमल करते हुए निकले और हफ्ते भर में घूमते घामते लखनऊ  आ गए। लखनऊ के पार्टी कार्यालय से उन्होने अधिवेशन के सभी प्रस्तावों और अध्यक्ष के भाषण की प्रति लेने के बाद प्रांतीय कमेटी के एक सदस्य से जो कि बंगलोर की गाड़ी से सुबह ही आया था,  सम्मेलन की विधिवत जानकारी भी ली और डायरी में नोट भी कर लिया।  इस वृतांत को शब्द दर शब्द रामनगर आकर दुहराया, जिससे सभी को उनकी बंगलोर यात्रा का पूर्ण विश्वास हो गया। उनके पड़ोसी चापलूसों की संख्या भी बढ़ गई थी। एक दिन तो चापलूसी की हद हो गई, चुंगी पर शाम को गंगापार से कन्हैया हलवाई किसी काम से आए। भगेलू सिंह की मंडली में बैठे और बातों बातों में बोलने लगे, ‘ठाकुर साहब एक दिन अधिवेशन का रिकार्डेड प्रसारण टीवी पर आ रहा था। हमने अचानक टीवी खोला कि बिटिया बोली कि अरे वो रहे भगेलू चाचा। फिर हम देखे कि बहुत बड़ा पंडाल था आप मसनद लगाकर मंच के नीचे दायी ओर बैठे थे, रह रह कर ऊंघ रहे थे। हम तुरंत दौड़कर दुकान पर गए और छोटी वाली टीवी चालू किए, वैसे तो बार बार कैमरा इधर उधर दिखा रहा था लेकिन हर बार जैसे ही मंच के नीचे फोकस करता, ठाकुर साहब दिख जाते। हमारे दुकान में तो भीड़ लग गई। सब देखने लगे। निहोरिया भी कढ़ाई छोड़ के टीवी के सामने आ गया। इस चक्कर में रबड़ी जल गई। शाम को बड़का बेटा उसको डांटने लगा। फिर हम बोले यार ठाकुर साहब टीवी पर दिखाई दे रहे हैं और तुम हो कि 20-25 लीटर दूध की रबड़ी के लिए चिल्लाहट कर रहे हो। खबरदार जो निहोरिया को कुछ अंड-बंड कहे तो। तब बड़का बोला अच्छा! ठाकुर साहब को टीवी पर देखने में रबड़ी जली है, तब कोई बात नहीं ।
      इतना सुनते ही चुंगी पर बैठे कुछ लोगों ने दावा किया कि उनके भी अमुक दोस्त या रिश्तेदर ने उन्हें देखा था। भोला तिवारी ने रही सही कसर पूरी घर दी। चाचा आप मंच से इतनी दूर क्यों बैठे थे?  भगेलू सिंह बोले अरे यार मंच के नीचे मसनद पे एकाध झपकी भी लेने का मौका रहता है। मंच के ठीक सामने अध्यक्ष जी के आगे ऊँघने में थोड़ा ठीक नहीं लगता। इस सूचना के बाद भोला और वे एक दूसरे को रहस्यमय तरीके से देख ही रहे थे कि गले में एक सुपाड़ी अटक गई। वो चुपचाप खाँसते हुए घर चले गए। लोग उन्हें पहले से अधिक सम्मान देने लगे। भगेलू सिंह की धाक फिर बन गई थी। कभी कभी जब उन्हें लगता कि असर कम हो रहा है तो पंचक या मलमास के दिनों में कोई मुद्दा लेकर भूख हड़ताल करने लगते। हड़ताल चुंगी या चौराहे पर होती। कोशिश की जाती कि भूख हड़ताल खत्म करने के लिए कोई प्रांतीय या राष्ट्रीय स्तर का नेता आए और जूस पिला दे जिससे हड़ताल एक दो दिन में खत्म हो और समाचार पत्रों में अच्छी कवरेज मिले।
      लगभग तीन चार महीने बाद कस्बे के ही एक व्यवसायी राधेश्याम गुप्ता की बेटी की शादी थी। लड़का बंगलोर में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। भगेलू सिंह को उनकी उपाधियों के साथ आमंत्रित किया गया था और वो भी उसी ठसक के साथ शामिल हुए। हलवाई से लेकर शामियाने वाले सभी को हड़काते रहे। द्वारपूजा में पंडित के बगल में बैठे। कोई ठाकुरसाहब कहकर संबोधित करता तो खुशी से फूले नहीं समाते। जयमाल की रस्म के बाद लड़के के पिता चाचा और अन्य समधी लोगों को भोजन कराया जा रहा था। भगेलू सिंह भी थोड़ी दूर पर बैठे थे। लड़के वाले बनारस के घाटों, मंदिरों की चर्चा करते हुए शहर की गंदगी और बिजली की कमी की बात चल पड़ी। लड़के वाले बनारस और बंगलोर की तुलना करते हुए शेख़ी बघार रहे थे। वैसे तो कोई कुछ जवाब नहीं दे रहा था क्योंकि लड़के वालों का प्रतिवाद भला कौन करे लेकिन जैसे ही उन्होने कहा कि भाई कुछ भी कहिए बंगलोर में रहने के बाद आपकी बेटी यूपी भूल जाएगी। यह बात राधेश्याम गुप्ता के बहनोई को खल गई जो कि खाँटी बनारसी थे। वे तुरंत भगेलू सिंह की तरफ मुखातिब हुए। बोले ठाकुर साहब जरा यहाँ आइए। समधी साहब से परिचय करा दूँ आपका। भगेलू सिंह को खतरे का आभास हो चला था। वे वहीं से बोले कि अरे भाई द्वारपूजा में मिल चुके हैं, आप जरा आराम से भोजन कराइए, आप खिला कम रहे हैं बात ज्यादा कर रहे हैं। लेकिन तब तक राधेशयम के बहनोई लड़के वालों से बोल पड़े कि जानते हैं भाई साहब अपने नेता जी अभी दीवाली से पहले बंगलोर में ही हफ्ता बिताकर लौटे हैं। अगर वो कह दें कि बंगलोर जाने के बाद बिटिया अपना गाँव देश भूल जाएगी तब हम मान जाएंगे।
      भगेलू सिंह का चेहरा अब कुछ सफ़ेद होने लगा। जबकि फरवरी का महीना था फिर भी माथे पर पसीना आने लगा। इससे पहले कि वे कोई और बहाना बनाते निकल जाते, लड़के चाचा और लड़की के फूफा उन्हीं के पास आ गए और उनके साथ वर पक्ष के एक दो लोग और थे। जैसे ही लड़के के चाचा ने पूछा, अरे ठाकुर साहब आप कब आए, किस ट्रेन से आए, वेलोर होते हुए आए या सिकंदराबाद होकर, कहाँ रुके थे, कब्बन पार्क देखा, केम्पेगौड़ा सर्किल गए, विधान सौधा देखा आदि आदि। भगेलू सिंह ने न तो झूठ बोला और न कुछ कहा। बुद्ध की तरह जीवन के सारभूत प्रश्नों पर मौन रहे। चुपचाप उठे और अपने घर चले गए। लड़के वालों ने कहा कि अजीब आदमी है, किसी बात का जवाब नहीं देते। किसी ने कहा सनकी है, किसी ने दंभी कहा। थोड़ी देर की बातचीत में ही सब समझ गए कि भगेलू सिंह कभी बंगलोर नहीं गए।
      अगली सुबह बारात जा चुकी थी और यह बात रामनगर में आम हो चली थी कि भगेलू सिंह ने सभी को उल्लू बनाया। चुंगी पर उस शाम रोजाना से ज्यादे भीड़ थी। लोग खुसफुसाहट कर रहे थे कि भगेलू सिंह अब कुछ दिनों तक चुंगी पर नहीं आएंगे। बाद में आएंगे भी तो किस मुंह से शाम को यहाँ बैठेंगे। कोई कह रहा था कि यार भगेलुआ गजब नौटंकीबाज है इसको तो नाटक में हाथ आजमाना चाहिए। शाम गहरी हो रही थी। कुछ लोग कह रहे थे कि अब पोल खुल गई,बहुत बढ़ बढ़ के बोलते थे, नेता की पूंछ बनते थे, अब तो इस आदमी का कोई विश्वास नहीं करेगा आदि आदि। हंसी मज़ाक का दौर जारी था कि अचानक सन्नाटा सा छा गया। जैसे अङ्ग्रेज़ी में कहते हैं पिन ड्रॉप साइलेंस ।
      लोगों ने देखा कि भगेलू सिंह उसी ठसक के साथ चुंगी की तरफ आ रहे हैं। धीमी खुसुर फुसुर के बीच उन्होने आवाज दी, ‘ अबे लल्लन जरा पान खिलाओ तो। फिर अपनी जगह जाकर बैठे। सबकी चुप्पी देख कर दो पल रुके, फिर बोले क्या बात है भाई आज काफी लोग जमा हैं। लल्लन ने पान दिया और बोला ठाकुर साहब लोग आज यही कह रहे है कि आपने बंगलोर अधिवेशन में जाने का झूठ क्यों फैलाया?
      बस इसके बाद तो जैसे बारूद फट पड़ा। भगेलू सिंह सबसे मुखातिब होकर बोले सालों, तसदीक करने आए हो। क्या सोचते हो तुम लोग? भगेलू सिंह भौकाल बनाने के लिए बंगलोर मीटिंग में जाने का टिकट कराया था और यहाँ से हफ्ते भर बाहर रहा। अरे कूढ़मगजों मैंने तुम्हारी ही भलाई के लिए ये सब किया। याद है नाटे मिस्त्री के लड़के का पुलिस ने किस तरह चालान किया था। मेरी सिफ़ारिश काम आई थी? नहीं आई न? दारोगा क्या बोला था? आप जैसे नेता बहुत देखे। और रघुनाथवा ने लड़के को छुड़वाया भी तो नाटे को कितना खर्चना पड़ा। अभी तक नाटे बो की हँसुली ज्वालाप्रसाद लालचंद सराफ के यहाँ गिरवी पड़ी है।  
जानते हो सालों तुमलोग, इसीलिए मैं बंगलोर गया था हाईकमान के बुलावे पर।
मेरे बंगलोर से आने के बाद भग्गू के यहाँ चोरी की रिपोर्ट किसके कहने पर लिखी गई? बोलो सब कि साँप सूंघ गया है। भीड़ ने कहा आपके कहने पर।
भगेलू सिंह बोलते गए, ‘नरायन का लड़का जो जबलपुर भागा था, उसको किसके पीछे पड़ने पर पुलिस ले आई?
भीड़ बोली आपके।
कस्बे में सोलह घंटे की बिजली कटौती को घटवाकर बारह घंटे करने के लिए भूख हड़ताल पर कौन बैठा?
भीड़- जी आप
भगेलू- सतनारायन लाल के बेटे को जब कटेसर वाले पीटकर अधमरा छोड़ गए तब कटेसर वालों को गिरफ्तार किसने करवाया?
भीड़-जी आपने
छक्कन के खलिहान में जब आग लग गई थी तो कलेक्टर के यहाँ से मुआवजा कौन दिलवाया ?
भीड़- आपने
      हरामखोरों पूरे कस्बे में कटिया मार के बिजली जलाते हो। हाइडिल वाले जब फुन्नन गुरु और सत्यवान के घर छापा मारे थे और इन दोनों को पकड़ कर ले जा रहे थे । बहुत कहने सुनने पर भी दस हजार से एक रुपया कम में हाइडिल वाले लेने को तैयार नहीं थे। सिर्फ चार हजार में मामला किसने रफा दफा करवाया?
भीड़- आपने और किसने 
      भगेलू सिंह ने सिंहनाद स्वर धरण करते हुए घोषणा की, ‘सालों जब तुम्हारा बेटा जुआ खेलते या दोपहिए पर तीन सवारी बैठाते हुए पकड़ कर हवालात जाता है और तुम लोगों की थाने के भीतर जाने में फटती है तो किसको साथ ले कर जाते हो?
भीड़- जी आपको
भगेलू सिंह जारी रहे, ‘ हर दुख विपत्ति, थाना कचहरी में भगेलू सिंह के बिना काम नहीं चलता और उल्टी सीधी अफवाहें फैलाते हो। मज़ाक उड़ाते हो। चल बताओ सब जने कि बंगलोर महाधिवेशन में रामनगर से कांग्रेस का कौन वरिष्ठ नेता भाग लेने गया था?
भीड़- जी आप गए थे।
      इसके बाद भगेलू सिंह भी ठहाका लगा कर हँसे। चुंगी पर जमा भीड़ ने भी ठहाका लगाया। हंसी के दौरान ही भगेलू सिंह ने आवाज लगाई,’ अबे जयराम चाय लाओगे या तुमको भी टेलीग्राम भेजें।
भीड़ धीरे धीरे छंटने लगी। अब वह भगेलू सिंह के बंगलोर यात्रा का महात्म्य समझ चुकी थी।    
    

    

      


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